जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक, जो 8 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में हुई, ने जीएसटी के आरम्भ से अब तक प्रवर्तन-पक्ष की सबसे महत्त्वपूर्ण सिफारिशें दी हैं। परिषद ने गिरफ्तारी की शक्ति को पूर्णतः वापस लेने, अभियोजन की मौद्रिक सीमा बढ़ाने, एक ऐसी न्यूनतम सीमा तय करने जिसके नीचे कोई कारण बताओ नोटिस जारी न हो, और कई शास्तियाँ घटाने की सिफारिश की है। उत्तर प्रदेश का कोई व्यवसाय जो पहले से किसी समन, तलाशी के बाद की कार्यवाही या माँग नोटिस का उत्तर दे रहा है, स्वाभाविक रूप से पूछेगा कि क्या इनमें से कुछ भी आज सहायक है।
संक्षिप्त उत्तर है: अभी नहीं। सरकार की अपनी प्रेस विज्ञप्ति इस सावधानी के साथ समाप्त होती है कि ये सिफारिशें सम्बन्धित परिपत्रों/अधिसूचनाओं/विधि संशोधनों के माध्यम से प्रभावी की जाएँगी, और केवल उन्हीं को विधि का बल प्राप्त होगा। नीचे वर्णित लगभग प्रत्येक बात के लिए संसद द्वारा सीजीएसटी अधिनियम, 2017 में संशोधन आवश्यक है — और यूपीजीएसटी अधिनियम, 2017 सहित सम्बन्धित राज्य अधिनियमों में भी। 24 अक्टूबर 2026 तक हमें ऐसा कोई संशोधन अधिनियमित हुआ नहीं मिला है। जब तक वह नहीं होता, नोटिस, आदेश और परिसीमा-अवधियाँ वर्तमान विधि के अनुसार ही चलेंगी।
1. गिरफ्तारी: धारा 69 को हटाने का प्रस्ताव
आज धारा 69 आयुक्त को यह अनुमति देती है कि यह विश्वास करने के कारण होने पर कि किसी व्यक्ति ने धारा 132(1) के खण्ड (क), (ख), (ग) या (घ) के अधीन कोई अपराध किया है — बिना बीजक के आपूर्ति, बिना आपूर्ति के बीजक, ऐसे बीजकों पर या बिना किसी बीजक के प्रत्यय लेना, और कर वसूल कर उसे तीन माह से अधिक समय तक जमा न करना — जो उस उपधारा के खण्ड (i) या (ii) के अधीन दण्डनीय है, वे किसी अधिकारी को उस व्यक्ति को गिरफ्तार करने हेतु प्राधिकृत करें। खण्ड (i) और (ii) ₹2 करोड़ से अधिक की राशियों को आच्छादित करते हैं।
परिषद ने "धारा 69 के लोप द्वारा जीएसटी के अधीन गिरफ्तारी की शक्तियों की पूर्ण वापसी" की सिफारिश की है। यह भविष्य के लिए सिफारिश है। यह स्वयं में धारा 67 के अधीन निरीक्षण, तलाशी और अभिग्रहण की शक्तियों या धारा 70 के अधीन समन की शक्ति को स्पर्श नहीं करती, और विज्ञप्ति में उनमें कोई परिवर्तन प्रस्तावित नहीं है। आज प्राप्त समन का उत्तर अब भी देना होगा।
2. अभियोजन: ऊँची सीमा और संकीर्ण अपराध
वर्तमान धारा 132(1) के अधीन, जहाँ अपवंचित कर, गलत रूप से लिया गया प्रत्यय या गलत रूप से लिया गया प्रतिदाय ₹5 करोड़ से अधिक हो, वहाँ पाँच वर्ष तक का कारावास; जहाँ वह ₹2 करोड़ से अधिक किन्तु ₹5 करोड़ से अधिक न हो, वहाँ तीन वर्ष तक; और केवल खण्ड (ख) के अधीन बिना आपूर्ति के बीजक जारी करने के अपराध में, जहाँ वह ₹1 करोड़ से अधिक किन्तु ₹2 करोड़ से अधिक न हो, वहाँ एक वर्ष तक का कारावास है। धारा 132(6) के अधीन अभियोजन हेतु आयुक्त की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
परिषद ने सिफारिश की है:
- अभियोजन की मौद्रिक सीमा ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ करना;
- धारा 132(1) के खण्ड (i) का लोप, खण्ड (ङ) से "कर का अपवंचन करता है" (evades tax) शब्दों का विलोपन, और खण्ड (ज) से "या किसी अन्य रीति से व्यवहार करता है" (or in any other manner deals with) शब्दों का विलोपन;
- खण्ड (ग) को केवल माल या सेवाओं की प्राप्ति के बिना, अथवा बिना बीजक या बिल के, इनपुट टैक्स क्रेडिट के कपटपूर्ण उपभोग तक सीमित करना; और
- धारा 132 के विभिन्न अपराधों हेतु दण्ड का युक्तिकरण।
क्या प्रस्तावित नहीं है: विज्ञप्ति सम्पूर्ण धारा 132 को निरस्त करने की सिफारिश नहीं करती। संशोधित सीमा से ऊपर के फर्जी-बीजक और कपटपूर्ण-प्रत्यय मामले अभियोजन योग्य बने रहेंगे, और दाण्डिक उपबंधों में किसी भी परिवर्तन से सिविल माँग — कर, ब्याज और शास्ति — अप्रभावित रहती है।
3. धाराओं 73, 74 और 74A के अधीन कारण बताओ नोटिस और शास्तियाँ
सामान्य व्यवसायों को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला भाग यही है। परिषद ने धाराओं 73, 74 और 74A में संशोधन कर निम्न प्रावधान करने की सिफारिश की है:
- ₹10,000 की न्यूनतम सीमा। जहाँ अन्तर्ग्रस्त कर (सीजीएसटी + एसजीएसटी + आईजीएसटी + उपकर) ₹10,000 से कम हो, वहाँ कोई कारण बताओ नोटिस नहीं। परिषद ने ऐसे वैधानिक उपबंध की भी सिफारिश की है जिसके अधीन ₹10,000 से कम के जो नोटिस और अपीलें सीमा के प्रवृत्त होने की तिथि को लम्बित हों, उनका विनिश्चय ऐसे किया जाएगा मानो नोटिस जारी होते समय वह सीमा लागू थी।
- गैर-कपट मामलों में शीघ्र भुगतान पर 5% शास्ति, जहाँ कर और ब्याज न्यायनिर्णयन आदेश के 30 दिनों के भीतर (धारा 73 के अधीन) या 60 दिनों के भीतर (धारा 74A के अधीन) चुका दिए जाएँ।
- गैर-कपट मामलों में ₹10,000 की न्यूनतम शास्ति नहीं। आज धारा 73(9) और धारा 74A(5)(i) कर के दस प्रतिशत या दस हज़ार रुपये, जो भी अधिक हो, की शास्ति विहित करती हैं।
- शास्ति को "प्रभार" (charge) माना जाना, जहाँ पूर्ण कर स्वेच्छा से ब्याज और शास्ति सहित विनिर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर चुका दिया जाए।
इनके साथ परिषद ने एक परिपत्र की सिफारिश की है जो अधिकारियों को माँग नोटिसों और आदेशों की गुणवत्ता व समयबद्धता, कपट, जानबूझकर मिथ्या कथन या तथ्यों के छिपाव के आधार को "प्रत्येक मामले में केवल गुण-दोष के आधार पर" लागू करने, और व्यक्तिगत सुनवाई के सम्बन्ध में व्यापक दिशानिर्देश दे। पृथक रूप से, धारा 125 के अधीन अधिकतम सामान्य शास्ति — जो आज उन उल्लंघनों हेतु "पच्चीस हज़ार रुपये" तक है जिनके लिए पृथक शास्ति विहित नहीं — को घटाकर ₹10,000 करने की सिफारिश है।
सिफारिश दिशा बताती है, बचाव नहीं बनती। हाथ में आए नोटिस का उत्तर आज जैसी पढ़ी जाती है उसी धारा के विरुद्ध तैयार करना होगा।
4. एक सिफारिश जो उलटी दिशा में जाती है
हर प्रस्ताव करदाता के पक्ष में नहीं है। परिषद ने सीजीएसटी अधिनियम, 2017 में ऐसे नोटिसों के विधिमान्यकरण हेतु एक विधिमान्यकरण खण्ड (validation clause) जोड़ने की भी सिफारिश की है, जिन्हें विभिन्न न्यायालयों ने एकाधिक वित्तीय वर्षों के लिए जारी किए जाने के आधार पर अविधिमान्य ठहराया है। जिस व्यवसाय की संयुक्त, बहु-वर्षीय नोटिस के विरुद्ध चुनौती केवल इसी आधार पर टिकी है, उसे अपेक्षा करनी चाहिए कि यह आधार विवादित होगा, और सुनिश्चित करना चाहिए कि उत्तर गुण-दोष पर भी दिया गया हो।
5. प्रत्यय अवरोधन और परिवहनाधीन माल
दो अन्य सिफारिशें सीधे प्रवर्तन से जुड़ी हैं:
- सीजीएसटी नियमावली के नियम 86A में संशोधन कर करदाता को इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर में किसी राशि के अवरोधन के विरुद्ध आपत्ति दाखिल करने, और उचित अधिकारी द्वारा उस आपत्ति पर निर्णय से पूर्व सुनवाई का अवसर देने का प्रावधान।
- धाराओं 68, 129 और 130 में संशोधन ताकि किसी वाहन को केवल विनिर्दिष्ट आसूचना पर और संयुक्त आयुक्त से अनिम्न पद के अधिकारी के प्राधिकार से ही रोका जा सके; निरोध या अभिग्रहण केवल तभी जब आपूर्तिकर्ता या प्राप्तकर्ता रोकने वाले राज्य में स्थित या पंजीकृत हो, पारगमन राज्यों में नहीं (उस अपवाद के अधीन जहाँ कोई ई-वे बिल या उद्गम/गंतव्य दर्शाने वाला दस्तावेज़ न हो); और धारा 130 के अधीन अधिहरण परिवहनाधीन माल या वाहनों पर लागू न हो। तब तक धारा 129 के अधीन निरोध की आज की स्थिति ही लागू रहेगी।
केवल-शास्ति वाले आदेशों के विरुद्ध अपीलों हेतु परिषद ने धाराओं 107(6) और 112(8) के परन्तुकों के अधीन पूर्व-जमा पर ₹40 करोड़ (₹20 करोड़ सीजीएसटी और ₹20 करोड़ एसजीएसटी/यूटीजीएसटी) की अधिकतम सीमा की सिफारिश की है — जो पहले चर्चित केवल-शास्ति आदेशों पर पूर्व-जमा से सम्बन्धित है।
यदि नोटिस, समन या आदेश हाथ में है तो अभी क्या करें
परिषद द्वारा निर्धारित दिशा स्पष्ट रूप से कम नोटिसों, छोटी शास्तियों और कम दमनकारी प्रवर्तन की ओर है। किन्तु परिषद की सिफारिश और प्रवर्तनीय उपबंध के बीच एक पूर्ण विधायी चक्र की दूरी है, और राज्य अधिनियमों को केन्द्रीय अधिनियम का अनुसरण करना होता है। जो पहले से कार्यवाही में है, उसके लिए उपयोगी मार्ग यही है कि नोटिस का निपटारा आज की विधि के अनुसार करें, और अभिलेख को ऐसे रूप में रखें कि संशोधन आने पर — यदि और जब आएँ — उनका लाभ लिया जा सके।
क्या आपके सामने जीएसटी नोटिस, समन या माँग है?
यदि लखनऊ अथवा उत्तर प्रदेश में आपके व्यवसाय तक कोई कारण बताओ नोटिस, समन, तलाशी के बाद की कार्यवाही या माँग आदेश पहुँचा है, तो दीक्षित लीगल उसे आज की विधि तथा प्रक्रियाधीन सुधारों के सन्दर्भ में देख सकता है और उत्तर तथा अगले कदम पर परामर्श दे सकता है।
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