आयकर  ·  लखनऊ  ·  अक्टूबर 2026

कर संपरीक्षा रिपोर्ट अब 21 अक्टूबर 2026 तक —परिपत्र 07/2026 क्या बदलता है, और क्या नहीं

अधिवक्ता एस.सी. दीक्षित  ·  लखनऊ उच्च न्यायालय  ·  अक्टूबर 2026  ·  7 मिनट पठन

28 सितम्बर 2026 को — निर्धारण वर्ष 2026-27 की कर संपरीक्षा (टैक्स ऑडिट) रिपोर्ट की नियत तिथि से दो दिन पहले — केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने परिपत्र संख्या 07/2026 (फा. सं. 225/128/2026/ITA-II) जारी किया। इसके द्वारा संपरीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत करने की तिथि 21 अक्टूबर 2026 तक, तथा संपरीक्षा मामलों में आय की विवरणी (आईटीआर) दाखिल करने की तिथि 21 नवम्बर 2026 तक बढ़ा दी गई है। उत्तर प्रदेश के जो व्यवसाय, फर्में और कंपनियाँ 30 सितम्बर की सीमा तक पहुँचने के लिए अपने संपरीक्षकों के साथ दौड़ रहे थे, उनके लिए यह तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय है।

परिपत्र केवल दो वाक्यों का है। इसी संक्षिप्तता के कारण इसे ध्यान से पढ़ना आवश्यक है: यह ठीक-ठीक बताता है कि क्या बढ़ाया गया है, और अन्य किसी विषय पर कुछ नहीं कहता। जिन बातों का इसमें उल्लेख नहीं है — ब्याज, करदाताओं की अन्य श्रेणियाँ, नई तिथि भी चूक जाने के परिणाम — बाद के नोटिस वहीं से आते हैं।

परिपत्र वास्तव में क्या कहता है

बोर्ड ने यह कार्रवाई आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 119 सहपठित आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 536 के अधीन की है। यह युग्म स्वयं में शिक्षाप्रद है। 2025 का अधिनियम कर वर्ष 2026-27 से आगे लागू होता है; पूर्ववर्ष 2025-26 (निर्धारण वर्ष 2026-27) की विवरणियाँ अभी भी 1961 के अधिनियम के अधीन ही दाखिल, संपरीक्षित और निर्धारित होती हैं, और परिपत्र उसी के अनुरूप तैयार किया गया है।

परिपत्र के अपने शब्दों में मुख्य परिवर्तन: धारा 139(1) के स्पष्टीकरण 2 के नीचे दी गई तालिका की क्रम संख्या 2 में निर्दिष्ट व्यक्तियों के लिए, निर्धारण वर्ष 2026-27 (पूर्ववर्ष 2025-26) की आय की विवरणी प्रस्तुत करने की नियत तिथि 31.10.2026 से बढ़ाकर 21.11.2026 की गई है। "परिणामस्वरूप", निर्धारण वर्ष 2026-27 की संपरीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत करने की विनिर्दिष्ट तिथि, धारा 44AB के स्पष्टीकरण के खंड (ii) के अनुसार, 21.10.2026 तक बढ़ी हुई मानी जाएगी।

इसकी कार्यप्रणाली पर ध्यान दें। बोर्ड ने संपरीक्षा की तिथि को अलग से नहीं बढ़ाया। उसने विवरणी की नियत तिथि बढ़ाई, और संपरीक्षा की तिथि स्वतः उसके साथ खिसक गई, क्योंकि धारा 44AB संपरीक्षा रिपोर्ट की "विनिर्दिष्ट तिथि" को धारा 139(1) के अधीन विवरणी की नियत तिथि से एक माह पूर्व की तिथि के रूप में परिभाषित करती है। 31 अक्टूबर से एक माह पूर्व 30 सितम्बर था; 21 नवम्बर से एक माह पूर्व 21 अक्टूबर है।

कौन आच्छादित है — और कौन नहीं

बोर्ड की अपनी प्रेस विज्ञप्ति लाभार्थियों को संपरीक्षा के अधीन व्यक्ति बताती है। तालिका की क्रम संख्या 2 मोटे तौर पर संपरीक्षा श्रेणी है: कंपनियाँ, ऐसा कोई अन्य व्यक्ति जिसके लेखाओं की संपरीक्षा आयकर अधिनियम अथवा किसी अन्य विधि के अधीन अपेक्षित है, तथा ऐसी फर्म के भागीदार जिसके लेखाओं की संपरीक्षा अपेक्षित है (और ऐसे भागीदार का पति/पत्नी, जहाँ धारा 5A लागू होती है)। अतः संपरीक्षित फर्म के भागीदार को नई तिथि का लाभ मिलता है, भले ही उसकी स्वयं की कोई व्यावसायिक आय न हो।

दो वर्गों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे इसके अंतर्गत आते हैं:

वह प्रश्न जिसका उत्तर परिपत्र नहीं देता: धारा 234A का ब्याज

धारा 234A अदत्त कर पर प्रत्येक माह अथवा माह के भाग के लिए एक प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज प्रभारित करती है, जो विवरणी की नियत तिथि के अगले दिन से चलता है। शाब्दिक रूप से पढ़ें तो, यदि नियत तिथि अब 21 नवम्बर है, तो धारा 234A का ब्याज केवल 22 नवम्बर से चलना चाहिए।

कठिनाई यह है कि परिपत्र संख्या 07/2026 ब्याज के विषय में मौन है। कुछ पूर्ववर्ती वर्षों में बोर्ड के विस्तार-आदेशों ने अधिक स्व-निर्धारण कर दायित्व वाले करदाताओं के लिए धारा 234A के ब्याज को स्पष्ट रूप से मूल तिथि से ही चालू रखा था। इस परिपत्र में ऐसा कोई अपवाद नहीं है — किंतु अपवाद का न होना एक तर्क है, गारंटी नहीं, और बोर्ड कभी भी स्पष्टीकरण जारी कर सकता है। व्यावहारिक उत्तर में कोई लागत नहीं है: कर की गणना करें, और स्व-निर्धारण कर का भुगतान 31 अक्टूबर 2026 तक कर दें, भले ही विवरणी बाद में दाखिल हो। चुकाए गए कर पर ब्याज नहीं लगता, चाहे कोई भी व्याख्या प्रबल हो।

विस्तार एक तिथि को आगे बढ़ाता है। जब तक वह स्वयं न कहे, ब्याज का हिसाब नहीं बदलता — और यह परिपत्र इस विषय में कुछ भी नहीं कहता।

यदि नई तिथियाँ भी चूक जाएँ

विस्तार को प्रायः समस्या का अंत मान लिया जाता है। जो करदाता 21 अक्टूबर अथवा 21 नवम्बर भी चूक जाता है, उसके लिए यह एक दूसरी समस्या का आरम्भ है। इसके तीन परिणाम होते हैं, और प्रत्येक सामान्यतः एक नोटिस के रूप में आता है:

1
संपरीक्षा रिपोर्ट हेतु धारा 271B की शास्ति लेखाओं की संपरीक्षा न कराने, अथवा धारा 44AB की अपेक्षानुसार संपरीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत न करने पर, कुल विक्रय, आवर्त (टर्नओवर) अथवा सकल प्राप्तियों के आधे प्रतिशत, अथवा ₹1,50,000, जो भी कम हो, की शास्ति लग सकती है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए यह विषय 1961 के अधिनियम के ही अधीन रहता है।
2
विवरणी हेतु धारा 234F का शुल्क नियत तिथि के बाद दाखिल विवरणी पर ₹5,000 का शुल्क लगता है, जो कुल आय ₹5 लाख से अधिक न होने पर घटकर ₹1,000 रह जाता है। धारा 139(4) के अधीन विलम्बित विवरणी 31 दिसम्बर 2026 तक (निर्धारण वर्ष की समाप्ति से तीन माह पूर्व), अथवा निर्धारण पूर्ण होने से पहले, जो भी पहले हो, दाखिल की जा सकती है।
3
हानि को अग्रेनीत करने के अधिकार की क्षति व्यावसायिक हानि अथवा पूँजीगत हानि को आगे तभी ले जाया जा सकता है जब हानि की विवरणी धारा 139(1) के अधीन अनुमत समय के भीतर दाखिल की गई हो, जैसा धारा 139(3) अपेक्षित करती है। विलम्बित विवरणी कर-दाखिले को तो जीवित रखती है, पर हानि के अग्रेनयन को नहीं बचाती।

धारा 271B का नोटिस विषय का अंत नहीं है

धारा 271B की शास्ति स्वचालित नहीं है। धारा 273B उपबंधित करती है कि जहाँ व्यक्ति यह सिद्ध कर दे कि विफलता का युक्तियुक्त कारण था, वहाँ उसके अधीन कोई शास्ति अधिरोपित नहीं की जाएगी। अधिकरणों ने विशिष्ट मामलों के तथ्यों पर संपरीक्षक का त्यागपत्र, लेखा-पुस्तकों की क्षति, अथवा लेखाओं के लिए उत्तरदायी व्यक्ति की बीमारी या मृत्यु जैसे कारणों को स्वीकार किया है। भार करदाता पर होता है, और वह समकालीन साक्ष्य से — संपरीक्षक के साथ पत्राचार, चिकित्सा अभिलेख, पोर्टल के स्क्रीनशॉट — पूरा होता है, न कि नोटिस आने के बाद जुटाए गए स्पष्टीकरणों से।

जो अभी विलम्ब में हैं, उनके लिए यही व्यावहारिक बिंदु है। यदि 21 अक्टूबर की तिथि वास्तव में संकट में है, तो कारणों को घटित होते समय ही अभिलिखित करें, बाद में पुनर्निर्मित न करें। और जहाँ किसी पूर्ववर्ती वर्ष के लिए धारा 271B का कारण बताओ नोटिस पहले ही प्राप्त हो चुका है, वहाँ युक्तियुक्त कारण का पक्ष उत्तर में ही बनता या बिगड़ता है; शास्ति आदेश, यदि पारित हो, अपील योग्य है, किंतु अभिलेख बड़े पैमाने पर नोटिस के चरण में ही तैयार होता है।

अगले तीन सप्ताह के लिए संक्षिप्त जाँच-सूची

संपरीक्षा में विलम्ब या शास्ति नोटिस?

यदि लखनऊ अथवा उत्तर प्रदेश में आपका व्यवसाय बढ़ी हुई तिथियाँ चूकने की आशंका में है, अथवा इस या किसी पूर्ववर्ती वर्ष के लिए धारा 271B, धारा 234A या धारा 234F के अधीन नोटिस प्राप्त हुआ है, तो दीक्षित लीगल नोटिस और अभिलेख की समीक्षा कर उत्तर तथा किसी अपील पर परामर्श दे सकता है।

व्हाट्सएप पर अपने मामले पर चर्चा करें → या कॉल करें +91 70809 16305

अधिवक्ता एस.सी. दीक्षित

लखनऊ उच्च न्यायालय  ·  अवध बार एसोसिएशन  ·  1999 से प्रैक्टिसरत

यह लेख सामान्य विधिक जानकारी है, जो 4 अक्टूबर 2026 तक अद्यतन है, और यह विधिक सलाह अथवा किसी प्रकार का याचन नहीं है। 28 सितम्बर 2026 के सीबीडीटी परिपत्र संख्या 07/2026 की अंतर्वस्तु स्वयं उसी परिपत्र से ली गई है; धाराएँ 44AB, 139, 234A, 234F, 271B तथा 273B आयकर अधिनियम, 1961 की हैं, जैसी वे निर्धारण वर्ष 2026-27 पर लागू हैं। बोर्ड ब्याज सहित अन्य विषयों पर आगे स्पष्टीकरण जारी कर सकता है; कृपया कार्रवाई करने से पूर्व वर्तमान स्थिति की पुष्टि कर लें। इस लेख को पढ़ने मात्र से अधिवक्ता–मुवक्किल संबंध स्थापित नहीं होता। यह लेख एआई सहायता से तैयार किया गया है तथा प्रकाशन हेतु दीक्षित लीगल द्वारा समीक्षित है।