अधिकांश जीएसटी विवाद एक कारण बताओ नोटिस से शुरू होते हैं और पहले स्तर पर एक न्यायनिर्णयन आदेश पर समाप्त होते हैं। उत्तर प्रदेश के व्यवसाय दोनों के बारे में प्रायः एक जैसी समस्याएँ बताते हैं। नोटिस स्पष्ट नहीं बताता कि गलती क्या है, तीन-चार वर्षों की मांग एक ही राशि के रूप में दिखाई जाती है, और "छिपाव" शब्द बिना किसी स्पष्टीकरण के प्रयुक्त होता है। फिर आने वाला आदेश कहता है कि "उत्तर पर विचार किया गया" और पूरी मांग की पुष्टि कर देता है।
26 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने परिपत्र संख्या 258/04/2026-जीएसटी जारी किया, जिसका विषय है "सीजीएसटी अधिनियम, 2017 के अंतर्गत मांग, न्यायनिर्णयन और अपील कार्यवाही से संबंधित मुद्दों पर स्पष्टीकरण"। यह सीजीएसटी अधिनियम की धारा 168(1) के अंतर्गत जारी हुआ है। परिपत्र में दर्ज है कि बोर्ड को ऐसे आदेशों के बारे में अभ्यावेदन मिले थे जो अस्पष्ट हैं, सकारण नहीं हैं, या करदाता के निवेदनों पर विचार नहीं करते। इसके बाद यह 18 पृष्ठों में बताता है कि नोटिस, सुनवाई, आदेश और प्रथम अपील कैसे होने अपेक्षित हैं।
परिपत्र अधिकारियों के लिए लिखा गया है। नोटिस प्राप्त करने वाला करदाता इसे उलटी दिशा से, अपने नोटिस को परखने की जाँच-सूची के रूप में, उपयोग कर सकता है।
नोटिस में स्वयं क्या होना चाहिए
अनुच्छेद 4 एक सुव्यवस्थित नोटिस को भागों में बताता है। मुख्य बिंदु हैं:
- पहचान और पृष्ठभूमि। नोटिस में नाम, जीएसटीआईएन, पंजीकरण की स्थिति, मुख्य व्यवसाय स्थल, क्षेत्राधिकार और संबंधित कर अवधि(याँ) होनी चाहिए। यह भी बताया जाना चाहिए कि मामला कैसे शुरू हुआ: निर्धारण, लेखापरीक्षा, विवरणी संवीक्षा या प्रवर्तन।
- तथ्य और साक्ष्य। कृत्यों या चूकों को वस्तुनिष्ठ रूप से रखा जाए और साक्ष्य पर चर्चा हो। परिपत्र "ऐसा प्रतीत होता है" जैसी तटस्थ भाषा अपनाने और "निर्धारित किया गया" जैसे शब्दों से बचने को कहता है, जिनसे लगे कि परिणाम पहले से तय है।
- विधि। प्रत्येक कृत्य या चूक को उस प्रावधान से जोड़ा जाए जिसके उल्लंघन का आरोप है। असंबंधित धाराएँ एक साथ न जोड़ी जाएँ, जब तक प्रत्येक स्वतंत्र रूप से लागू न हो।
- परिमाणन। प्रस्तावित मांग का परिमाणन हो और उसका आधार बताया जाए। जहाँ नोटिस कई वित्तीय वर्षों का हो, वहाँ मांग को वित्तीय वर्षवार अलग करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
- निष्कर्ष। अंतिम अनुच्छेद में न्यायनिर्णयन प्राधिकारी, उत्तर देने की अंतिम तिथि और उत्तर न देने के परिणाम बताए जाएँ।
परिपत्र सर्वोच्च न्यायालय के जी.आर. इन्फ्रा प्रोजेक्ट लि. बनाम मध्य प्रदेश राज्य (19 अगस्त 2026) निर्णय पर आधारित है। उस मामले में न्यायालय ने माना कि नोटिस को टिकाए रखने के लिए जो आवश्यक है वह नोटिस में ही होना चाहिए। नोटिस की कोई कमी, जिसमें विवेक का प्रयोग न करना भी शामिल है, बाद में ठीक नहीं की जा सकती।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: धारा 75(7) के अंतर्गत आदेश नोटिस में प्रस्तावित राशि से अधिक कर, ब्याज या शास्ति की पुष्टि नहीं कर सकता, और न ही नोटिस में न बताए गए आधारों पर मांग की पुष्टि कर सकता है। परिपत्र अनुच्छेद 11.6 में यही दोहराता है। इसलिए अस्पष्ट या बिना परिमाणन वाला नोटिस यह सीमित कर देता है कि बाद का आदेश विधिपूर्वक क्या कर सकता है।
"कपट" और "छिपाव" के लिए केवल शब्द नहीं, सामग्री चाहिए
परिपत्र का सबसे व्यावहारिक भाग अनुच्छेद 5 है। धारा 74(1), और वित्तीय वर्ष 2024-25 से धारा 74A(5)(ii), वहाँ लागू होती हैं जहाँ कर का भुगतान "कर अपवंचन के लिए" कपट, जानबूझकर मिथ्या कथन या तथ्यों के छिपाव के कारण नहीं हुआ। परिपत्र कहता है कि:
- नोटिस में कपट या छिपाव के आरोप का आधार विशेष रूप से बताया जाना चाहिए, और इन शब्दों का यांत्रिक प्रयोग पर्याप्त नहीं है;
- इस वाक्यांश में कर अपवंचन का आशय निहित है। कोई चूक या गलत कथन तब तक छिपाव या जानबूझकर मिथ्या कथन नहीं है जब तक वह सोच-समझकर न किया गया हो;
- ये प्रावधान केवल जीएसटी के भुगतान न होने के आधार पर नहीं लगाए जा सकते। न ही ये संवीक्षा मामलों के लिए हैं केवल इसलिए कि कोई विसंगति मिली है;
- उन्हीं तथ्यों पर बाद की अवधि का दूसरा नोटिस सामान्यतः धारा 73 या धारा 74A(5)(i) के अंतर्गत जारी होना चाहिए, फिर से कपट के मामले के रूप में नहीं, जब तक नए और स्वतंत्र आधार न हों।
जहाँ नोटिस धारा 73 और धारा 74 दोनों के अंतर्गत मांग प्रस्तावित करता है, वहाँ विभाजन के कारण और प्रत्येक के अंतर्गत अलग परिमाणन आवश्यक है (अनुच्छेद 6); यही बात वित्तीय वर्ष 2024-25 से आगे के उन नोटिसों पर लागू है जिनमें दोनों प्रकार के आरोप हों। परिपत्र यह भी बताता है कि वित्तीय वर्ष 2024-25 से लागू धारा 74A में नोटिस जारी करने के लिए वार्षिक विवरणी की नियत तिथि से 42 माह की एक ही अवधि है, कपट और गैर-कपट दोनों मामलों के लिए।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है कि कपट-आधारित मांगों के शास्ति परिणाम अधिक भारी होते हैं, और 2024-25 से पहले की धाराओं में परिसीमा अवधि भी लंबी है। यदि आरोप की सामग्री नोटिस में नहीं है, तो अनुच्छेद 13 न्यायनिर्णयन अधिकारी को यह निष्कर्ष दर्ज करने और मांग को धारा 73 या धारा 74A(5)(i) तक सीमित रखने को कहता है।
कपट के आरोप के पीछे की सामग्री नोटिस में ही होनी चाहिए।
व्यक्तिगत सुनवाई
धारा 75(4) में सुनवाई आवश्यक है जहाँ करदाता लिखित रूप में इसका अनुरोध करे या जहाँ प्रतिकूल निर्णय विचाराधीन हो। धारा 75(5) तीन से अधिक स्थगन की अनुमति नहीं देती। इसी आधार पर अनुच्छेद 10.1 कहता है कि अधिकारी अधिकतम चार सुनवाई अवसर दे सकते हैं, और स्थगन अस्वीकार करने के कारण लिखित में दर्ज होने चाहिए। परिपत्र यह भी कहता है कि:
- धारा 116 के अंतर्गत प्राधिकृत प्रतिनिधि की उपस्थिति के अनुरोध पर उचित विचार हो;
- वर्चुअल सुनवाई का विकल्प दिया जा सकता है;
- प्रत्येक सुनवाई का अभिलेख (तिथि, समय, उपस्थित व्यक्ति) रखा जाए और आदेश में दर्शाया जाए;
- आदेश सुनवाई के बाद यथासंभव एक माह के भीतर संसूचित किया जाए;
- अधिकारी के स्थानांतरण पर उत्तराधिकारी अधिकारी को नई सुनवाई देनी होगी।
चूँकि स्थगन सीमित हैं, इसलिए शुरुआती सुनवाई को औपचारिकता नहीं मानना चाहिए। प्रायः यही दस्तावेज़ और तर्क अभिलेख पर रखने का मुख्य अवसर होता है।
आदेश: प्रत्येक बिंदु पर कारण
अनुच्छेद 11 "सकारण आदेश" की अपेक्षा करता है। आदेश में प्ररूप जीएसटी डीआरसी-06 में या सुनवाई में किए गए प्रत्येक निवेदन की जाँच हो और कारणों सहित बताया जाए कि वह स्वीकार, आंशिक रूप से स्वीकार या अस्वीकार किया गया। "उत्तर पर विचार किया गया" जैसे सामान्य वाक्यों से बचना है। करदाता द्वारा उद्धृत निर्णयों पर चर्चा हो, और अप्रासंगिक पाए जाने पर कारण दर्ज हों। परिमाणन मुद्देवार और यथासंभव वर्षवार हो, तथा सीजीएसटी, एसजीएसटी, आईजीएसटी और यूटीजीएसटी के लिए अलग-अलग हो। पहले से जमा की गई कोई भी राशि समायोजित की जाए। शास्ति यांत्रिक रूप से नहीं लगाई जानी है, और धारा 126 के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं। आदेश का सारांश प्ररूप जीएसटी डीआरसी-07 में अपलोड होना है।
परिशोधन और प्रथम अपील
धारा 161 के अंतर्गत परिशोधन अभिलेख से प्रकट त्रुटियों तक सीमित है और उसे वही प्राधिकारी करेगा जिसने आदेश जारी किया। परिपत्र कहता है कि इसका प्रयोग अपील के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। आवेदन आदेश से तीन माह के भीतर किया जाना है, और परिशोधन छह माह के भीतर होना है, विशुद्ध लिपिकीय या गणितीय त्रुटियों को छोड़कर। निपटान प्ररूप जीएसटी डीआरसी-08 के माध्यम से होता है।
धारा 107 के अंतर्गत प्रथम अपील के लिए परिपत्र आदेश की संसूचना से तीन माह की अवधि दोहराता है, जिसके बाद धारा 107(4) के अंतर्गत एक माह का विलंब क्षमा किया जा सकता है। परिसीमा का प्रश्न पहले, प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाना है, और क्षमा-योग्य अवधि के बाद दायर अपील पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय नहीं होना चाहिए। अपील के पंजीकरण के चरण पर गुण-दोष के आधार पर उसे अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। धारा 107(13) के अंतर्गत यथासंभव अपील का निर्णय एक वर्ष के भीतर होना चाहिए।
आपके सामने रखे नोटिस के लिए जाँच-सूची
अनुच्छेद 17 कहता है कि ये दिशानिर्देश उदाहरणात्मक और अपूर्ण हैं, और अधिकारी इन्हें नोटिस या आदेशों में उद्धृत नहीं करेंगे। परिपत्र स्वयं में किसी नोटिस को अमान्य नहीं बनाता। इसका मूल्य इसमें है कि यह एक स्थान पर बताता है कि अधिनियम और न्यायालय पहले से क्या अपेक्षा करते हैं। उत्तर तैयार करने के लिए यह एक उपयोगी ढाँचा है। संबंधित लेख: धारा 73 या 74 — अंतर क्यों महत्वपूर्ण है तथा जीएसटी कारण बताओ नोटिस का उत्तर।
जीएसटी कारण बताओ नोटिस या मांग आदेश प्राप्त हुआ है?
यदि लखनऊ अथवा उत्तर प्रदेश में कहीं आपको किसी केंद्रीय या राज्य जीएसटी अधिकारी से प्ररूप डीआरसी-01 में नोटिस या प्ररूप डीआरसी-07 में आदेश मिला है, तो दीक्षित लीगल उसे अधिनियम और इस परिपत्र की कसौटी पर पढ़कर उत्तर, सुनवाई या अपील पर परामर्श दे सकता है, जब तक समय-सीमाएँ खुली हैं।
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