उत्तर प्रदेश में जीएसटी विवाद देखने वाला हर व्यक्ति इस क्रम से परिचित है। एक व्यवसाय हर माह अपनी विवरणियाँ दाखिल करता है और कर चुकाता है। वह पोर्टल का "View Notices and Orders" खंड देखता है और उसे कुछ भी लंबित नहीं मिलता। फिर अचानक उसका बैंक खाता कुर्क हो जाता है या वसूली नोटिस आ जाता है। जब पोर्टल को ध्यान से खोजा जाता है, तो कारण-बताओ नोटिस, अनुस्मारक और एक एकपक्षीय माँग आदेश एक दूसरे खंड, "Additional Notices and Orders", में मिलते हैं। तब तक अपील के तीन माह बीते हुए प्रतीत होते हैं।
इस वर्ष के दो उच्च न्यायालय निर्णय सीधे इसी स्थिति से संबंधित हैं। इनमें नवीनतम, 12 अक्टूबर 2026 का बॉम्बे उच्च न्यायालय का निर्णय, उस प्रश्न का उत्तर देता है जो समय-सीमा चूकती प्रतीत होने पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है: अपील का समय वास्तव में कब से चलना आरंभ होता है?
विधि संसूचना से गणना करती है, अपलोड से नहीं
सीजीएसटी अधिनियम की धारा 107(1) निर्णयन आदेश से व्यथित व्यक्ति को उस तिथि से तीन माह के भीतर अपील करने देती है, जिस तिथि को वह निर्णय या आदेश उस व्यक्ति को संसूचित किया जाता है। धारा 107(4) के अंतर्गत, यदि अपील प्राधिकारी संतुष्ट हो कि अपीलार्थी पर्याप्त कारण से रोका गया था, तो वह एक माह की अतिरिक्त अवधि दे सकता है। विधि यह नहीं कहती कि समय आदेश के जनरेट या अपलोड होने की तिथि से चलता है।
धारा 169(1) उन तरीकों को सूचीबद्ध करती है जिनसे नोटिस या आदेश तामील किया जा सकता है। इनमें सीधी सुपुर्दगी, रजिस्ट्री या स्पीड पोस्ट, पंजीकृत पते पर ई-मेल, और खंड (घ) के अंतर्गत "सामान्य पोर्टल पर उपलब्ध कराना" सम्मिलित हैं। पोर्टल पर अपलोड करना एक वैध तरीका है। इन मामलों में विवाद इससे संकरा है। प्रश्न यह है कि क्या पोर्टल के ऐसे खंड में रखा गया आदेश, जहाँ आदेश रखे जाने अपेक्षित नहीं थे, उस अर्थ में संसूचित हुआ है जिसकी धारा 107 अपेक्षा करती है।
व्यावहारिक बात: यदि जिस आदेश को आप चुनौती दे रहे हैं वह केवल "Additional Notices and Orders" में दिखा, तो उसके अपलोड होने की तिथि आवश्यक रूप से आपकी परिसीमा आरंभ होने की तिथि नहीं है। आपको उसकी वास्तविक जानकारी जिस तिथि को हुई, और किस प्रकार हुई, यही तय कर सकता है कि अपील अभी भी सुनी जा सकती है या नहीं।
बॉम्बे उच्च न्यायालय, 12 अक्टूबर 2026: अपील पुनर्जीवित
एल्स्टर मीटरिंग प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य, रिट याचिका संख्या 12273/2026 में, न्यायमूर्ति एम.एस. कार्णिक तथा न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटिल की खंडपीठ के समक्ष मामला यह था कि धारा 73(9) के अंतर्गत 29 अगस्त 2024 का निर्णयन आदेश "View Notices and Orders" में नहीं, बल्कि "Additional Notices and Orders" में अपलोड किया गया था। कंपनी का कहना था कि उसे आदेश की जानकारी फरवरी 2025 में ही हुई। उसने 25 फरवरी 2025 को विलंब माफ़ी के आवेदन के साथ अपील दाखिल की। अपील प्राधिकारी ने 24 अप्रैल 2025 को अपील कालातीत मानकर अस्वीकार कर दी। उसका तर्क था कि कंपनी उसी पोर्टल पर विवरणियाँ दाखिल करती और कर चुकाती थी, अतः उसे पोर्टल की जानकारी रही होगी।
उच्च न्यायालय ने यह तर्क अस्वीकार कर दिया। उसने माना कि अपील प्राधिकारी ने आवधिक विवरणियाँ दाखिल करने को ऐसे टैब में रखे आदेश की जानकारी के साथ भ्रमित कर दिया था, जिसमें आदेश रखे जाने अपेक्षित ही नहीं थे। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्राधिकारी ने संसूचना के बजाय "अमूर्त तामील" पर भरोसा किया था, जबकि धारा 107(1) संसूचना की अपेक्षा करती है। सर्वोच्च न्यायालय के प्राधिकारों पर भरोसा करते हुए, न्यायालय ने संसूचना को प्रभावित व्यक्ति तक इतनी जानकारी पहुँचाना माना जिससे वह प्रभावी अभ्यावेदन कर सके। उसने यह भी कहा कि भले ही अपील प्राधिकारी को परिसीमा बढ़ाने की शक्ति न हो, अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता उस सीमा से कम नहीं होती। न्यायालय ने विलंब माफ़ किया, अपील को पुनर्जीवित किया और निर्देश दिया कि व्यक्तिगत सुनवाई के बाद गुण-दोष पर उसका निर्णय किया जाए। माँग के गुण-दोष पर न्यायालय ने कोई निर्णय नहीं दिया।
परिसीमा अंतिमता की रक्षा करती है। वह उस आदेश को अंतिम नहीं बनने देती जो कभी संसूचित ही नहीं हुआ।
लखनऊ खंडपीठ की निर्णय-श्रृंखला: माँग और वसूली दोनों निरस्त
इलाहाबाद उच्च न्यायालय इस विषय पर पहले से विचार करता आया है। ओला फ्लीट टेक्नोलॉजीज़ प्रा. लि. बनाम उ.प्र. राज्य, रिट टैक्स संख्या 855/2024, निर्णय दिनांक 22 जुलाई 2024 में, राज्य के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि करनिर्धारण अधिकारी के पास पोर्टल पर यह चुनने का कोई विकल्प नहीं है कि आदेश करदाता को किस टैब में दिखे। कोई भी सुधार जीएसटी नेटवर्क को ही करना होगा। न्यायालय ने करदाता को संदेह का लाभ दिया और नए नोटिस का निर्देश दिया।
लखनऊ खंडपीठ ने इसी निर्णय का अनुसरण मेसर्स प्रधान ट्रेडिंग कंपनी बनाम उ.प्र. राज्य, रिट टैक्स संख्या 963/2026 में किया, जिसका निर्णय 28 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति आलोक माथुर तथा न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय ने दिया। धारा 73 के नोटिस "Additional Notices and Orders" में अपलोड किए गए थे। विभाग ने इस पर विवाद नहीं किया। न्यायालय ने 13 फरवरी 2025 का निर्णयन आदेश, फॉर्म जीएसटी DRC-07 का सारांश आदेश, तथा 17 नवंबर 2025 का फॉर्म जीएसटी DRC-16 में कुर्की एवं विक्रय का नोटिस निरस्त कर दिया। उसने कम से कम पंद्रह दिनों का स्पष्ट समय देते हुए नया नोटिस जारी करने की अनुमति दी। उसने यह भी निर्देश दिया कि शास्ति की वसूली नई कार्यवाही में पारित अंतिम आदेश पर निर्भर रहेगी।
दोनों निर्णय धारा 75(4) से जुड़ते हैं, जिसके अनुसार जहाँ भी कोई प्रतिकूल निर्णय विचाराधीन हो, सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। जो नोटिस करदाता उचित रूप से खोज ही न सके, वह इस सुनवाई को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी बना देता है।
यह तर्क कहाँ सफल नहीं होता
यह हर माँग से स्वतः बच निकलने का मार्ग नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कम से कम एक मामले में टैब संबंधी तर्क अस्वीकार किया है। उस मामले में नोटिस 16 जनवरी 2024 के बाद पोर्टल में किए गए परिवर्तनों के पश्चात् जारी हुआ था, और याचिकाकर्ता के अपने स्क्रीनशॉट से दिखता था कि "Additional Notices" टैब उसे दिखाई दे रहा था। तथ्य और तिथियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। जिस करदाता ने नोटिस देखा और कुछ नहीं किया, उसकी स्थिति उस करदाता से बहुत भिन्न है जो उसे उचित रूप से खोज ही नहीं सकता था। न्यायालय भी प्रायः दायित्व को सीधे निरस्त करने के बजाय मामले को नए निर्णयन हेतु वापस भेजते हैं। माँग की पुनः जाँच होती है, इस बार सुनवाई के साथ।
यदि माँग इस प्रकार सामने आए तो क्या करें
दो आदतें इस जोखिम को पहले ही कम कर देती हैं। जब भी लॉग-इन करें, दोनों टैब जाँचें, और पंजीकृत ई-मेल पता तथा प्राधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का विवरण अद्यतन रखें। इनमें से कोई भी आदत पहले से लंबित माँग को प्रभावित नहीं करती, परंतु दोनों अगली माँग के अनदेखी रह जाने की संभावना कम करती हैं।
ऐसा माँग आदेश जो आपको केवल "Additional Notices" टैब में मिला?
यदि लखनऊ अथवा उत्तर प्रदेश में कहीं ऐसी कार्यवाही से कोई जीएसटी आदेश, कुर्की या वसूली नोटिस सामने आया है जो आपने कभी देखी ही नहीं, तो दीक्षित लीगल पोर्टल अभिलेख, तिथियों तथा आदेश की समीक्षा कर सकता है और परामर्श दे सकता है कि आपके तथ्यों पर अपील, विलंब माफ़ी आवेदन या रिट याचिका का मार्ग उपलब्ध है या नहीं। आदेश पारित होने के बाद वसूली शीघ्र आरंभ हो सकती है, इसलिए शीघ्र समीक्षा से यह प्रभावित हो सकता है कि कौन-से मार्ग उपलब्ध रहते हैं।
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